रविवार, 23 अगस्त 2015

अभिशप्त साहित्यकार




लेखकों पर यह कहावत सौ फीसदी लागू होती है खासकर नवोदितों पर और स्थापितों पर भी कहीं न कहीं “अँधा क्या चाहे दो आँख ”| मैं बात इस सन्दर्भ में कह रहा हूँ की लेखकों में छपास की इतनी अधिक लालसा होती है कि वह बिना मानदेय के कहीं भी छपने को तैयार रहते हैं यहाँ तक की पैसे देकर भी पत्र-पत्रिकाओं में छपने को लालायित रहते हैं बस कैसे भी छप जाएँ।
क्या लेखक जो लिखता है उसपर उसे विश्वास नहीं होता की लोग पसंद करेंगे या पत्र-पत्रिकाएं उन्हें छाप कर लेखकों पर अहसान करती है क्या मानदेय एक लेखक का हक नहीं है क्या साहित्य केवल मुफ्त में छपने के लिए हैं खासकर उस समय जब पत्र-पत्रिकाएं वाणिज्य रूप से चलती हैं लाखों के विज्ञापन आते हैं जब आप छापेखाने का खर्च उठा सकते हैं, कागज का खर्च उठा सकते हैं, और जिससे आपका नाम और व्यवसाय चल रहा है उस लेखक को सांकेतिक मानदेय का खर्च नागवार गुजरता है ।
क्या साहित्य सृजन करने वाले यूँ ही बंधुआ मजदूर की भाँती बेगार करते रहेंगे...| क्या केवल शील्ड से उनका पेट भरता रहेगा ......इस अर्थ तंत्र के युग में साहित्य को अर्थ से क्यों नहीं जोड़ा जा रहा है इसमें सबसे बड़ी गलती लेखकों की स्वयं है कि वो अपने को सबसे गया गुजरा समझते हैं | या उन्हें अपनी लेखनी पर विश्वास नहीं है यदि वाकई आप अच्छा लिखते हैं तो उसका छपने पर मानदेय भी मिलना चाहिए क्या ये खर्च इतना अधिक है जिसके बदौलत पत्रिकाएं निकल रही हैं उसको ही अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है ।
हम स्त्री विमर्श की बात करते हैं असल में तो बात करने वाले साहित्यकारों की स्थिति उन स्त्रीयों से भी गयी गुजरी है जो घर और बाहर काम करती हैं पर कुछ कह नहीं सकती यदि कहें तो उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है या उनके साथ बदसलूकी होती है ।
लेखक वर्ग तो इतना डरा हुआ है की वो चूं भी नहीं कर सकता है दूसरों के लिए आवाज उठाने वाले खुद के लिए कब बोलोगे | जैसे स्त्रीयों के लिए स्त्रीयां ही सबसे बड़ी बाधक हैं उनके उत्थान में वैसे ही लेखक वर्ग का भी यही हाल है |
साहित्य मुफ्त में लिखी जाने वाली चीज क्यों है? इस क्षेत्र का उत्थान कब होगा खासकर भारतीय सन्दर्भ में क्यों एक साहित्यकार इसको अपनी आजीविका का साधन नहीं बना पाता? स्वयं को समाजसेवी कहने वाले लोग, लोगों के सच्चे हितैसी खुद को बताने वाले  राजनेता भी पहले अपना घर भरते हैं फिर कहीं जाकर लोगों की बात करते हैं । लेखक वो है जो समाज की हित की उत्थान की बात करता है पर खुद का उत्थान करना उसके लिए सबसे दुरूह कार्य है । अपनी मेहनत का मेहनताना मांगने में क्या हर्ज है क्या साहित्यकार एक बधुआ मजदूर से या कहें दास से भी गया गुजरा है मुझे तो अधिकतर दास के अलावा कोई दिखाई नहीं देता है जो लिखता तो है पर रोटी के लिए खुद रोता है पर कह नहीं सकता है यह मुफ्तखोरी साहित्य की कबतक चलेगी । आज प्रकाशन का क्षेत्र काफी विस्तृत हो गया है यह केवल कहने की बात है की किताबे बिकती नहीं है अगर ऐसा है तो नित्य नए प्रकाशन कैसे उदय हो रहे है क्या सभी लोग इतने समाजसेवी हैं भूखे पेट कितने दिन राम-राम ।
यह एक गंभीर विषय है इसकी अनदेखी कई अच्छे साहित्यकारों को निगल रही है सबसे बड़ी बात जो खुद को राह नहीं दिखा सकता जो खुद के लिए आवाज नही उठा सकता है वो दूसरों की भलाई समाज सेवा जैसी बड़ी-बड़ी बातों पर कैसे मुखर लिख तो सकता है जिसपर उसका खुद विश्वास नहीं है । क्या साहित्य इसलिए जिन्दा है क्यों की मुफ्तखोरी इसपर हावी है नहीं तो और कलाओं की तरह इसका भी कब्र खुद गया होता । कदाचित नहीं क्योंकि साहित्य लिखने वालों का सम्मान राजवन्सो में ज्यादा है लोकतंत्र में यदि किसी का सबसे जयादा ह्रास हुआ है तो वो साहित्य लिखने वालों का । सबसे पहले इस छपास की प्रविती पर खुद को काबू में रखना होगा और एक शब्द ‘न’ भी सीखना होगा बिना मानदेय के और बेगारी बंद करनी होगी । क्या ऐसा हो सकता है ?
मनोज कुमार ‘मैथिल’

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