गुरुवार, 13 अगस्त 2015

भिन्न भिन्न मुंडे मतिर भिन्ना ....




यह मानव की सुलभ प्रकृति है .........जो इस प्रकृति को समझ जाता है वो सम रह पता है नहीं तो भिड़ते देर नहीं लगती ........विचार वो भी राजनैतिक आजीवन एक से कभी नहीं रहते ........... यह कई बार बिन पैंदे के लोटे जैसे होते हैं और बदलाव प्रक्रति का नियम है इसको मानना चाहिए साहत्य का स्वरुप भी हमेशा एक सा नहीं रहता समय के साथ जो चीजें अनिवार्य होती हैं वो बेमानी भी हो जाती हैं और अगर पिछले समय समाज को आज के सन्दर्भ में तौलें तो बहुत सी चीजें गलत होगीं  ।ऐसी बहसों से साहित्य को उर्जा मिलनी चाहिए पर ........कभी -कभी उर्जा का ह्रास भी होता है ........दिक्कत वहाँ शुरू होती है जब एक दायरे में बंध कर बात शुरू होती है और उस तालाब से निकलना नहीं चाहते और उसके पानी में जो जो देखने में सक्षम हैं उसी को मान लेते हैं जब तक दूसरी चीजें न देखें..........।
कदाचित अहम में सहमत या मानते हुए ही न मानना मजबूरी हो जाती है क्या एक व्यक्ति साहित्यिक पर इतना हावी हो सकता है .........यह सोचनीय विषय है ........एक साहित्यकार वो नहीं जो केवल साहित्य लिखता है वरन वो है जो सर्वांगिक दृष्टि भी रखता हो जो एक सही साहित्य को जन्म देने के लिए अति आवश्यक है यदि साहित्यकार ही अपनी दृष्टि और करनी को संकुचित कर लेगा तो समाज को वो क्या देगा ........|
 मित्रता सभी चीजों से सर्वोपरि होनी चाहिए। खासकर साहित्यिक रूप से जुड़े लोगों में तुछ राजनीती और अनर्गल बहस में अपनी उर्जा और समय नष्ट करने से अच्छा कुछ नया रचें जो समाज और साहित्य की पूंजी बन सके ........सबसे बड़ी समस्या साहित्यकारों के साथ अपने अहम् को लेकर होती है ....उसने मेरी बात क्यों नहीं मानी या मैं सबसे बड़ा हूँ मेरी समझ सर्वोच है ......एक हाथी की तरह मस्त ......पर भाई कभी-कभी चीटीं भी बहुत बड़ी बात कह जाती है ......और जब ऐसा होता है तो अहम् को ठेस पहुँचती है अरे उसने ऐसा कह दिया ........किनारा कर लेना अपने को अलग कर लेना बहुत आसान काम है। पर संगठित करना उतना ही मुश्किल ...........| सौ लोगों को छोड़ना आसान है पर एक को साथ लेकर चलना कहीं अधिक कठिन है
कुछ लोग मित्थिया प्रचार पाने के लिए सही को गलत और गलत को सही करने पर तुले रहते हैं ये नहीं है कि आप की गलत बात के समर्थक नहीं मिलेंगे एक ढूंढो हजार मिलेंगे इसका मतलब यह नहीं की गलत सही हो जाएगा .....और सही गलत । विचार करने योग बात यह होती है की आप किस दृष्टि से देखते हैं जब आप किसी नकारात्मक सोच में सकरात्मका देखने की कोशिश करोगे तो वो भी आपको मिलेगा और उसी प्रकार नकारात्मकता भी .....|
जब किसी पर दोषारोपण करते हैं तो उस समय एक बार सोचें की क्या मैं यह अपने दायरे को सिमित करके तो नहीं कर रहा हूँ कदाचित उस तथ्य को देखने का पहलु ही गलत हो एक बार दुसरे पहलु पर भी उसी गिद्ध दृष्टि से देखें जिससे अपने विचार को देखते हैं .....फिर आप सही और निष्पक्ष व्यवस्था की बात कर सकते हैं ।

मनोज कुमार ‘ मैथिल ‘

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