शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

दलित लेखन –साहित्य वर्ग विभाजन औचित्य एवं उपयोगिता


साहित्य तो साहित्य है जो समाज को एक दृष्टिकोण देता है | समाज का एक दर्पण है जो समाज में हो रहे बदलाव सोच को प्रस्तुत करता है | नदियाँ चाहे कहीं से भी गुजरे मिलना उन्हें समुद्र में ही है वही सागर साहित्य है | तारे असंख्य हैं पर गगन एक है वही साहित्य है इसको नाम पे बांटना अपने दृष्टिकोण को छोटा करना है |
हम समाज की कुरीतिओं से विचलित होते हैं | और उन्ही कुरीतिओं को, साहित्य को वर्ग में विभाजित कर अंगीकार कर रहे हैं | हम कहते हैं की समाज में सभी का एक घाट होना चाहिए दलित का पानी या सवर्ण का पानी | पर क्या साहित्य को बाँट कर हम फिर से अलग अलग कुआँ नहीं खोद रहे हैं | तब समाज कैसे एक होगा जब तक हम हर प्रकार से एक ना हों |
लेखक तो लेखक होता है कोई दलित या सवर्ण नहीं | पर वर्गों में बाटना जाती प्रथा को बढ़ावा देना हैं समाज को कमजोर करना है यह काम लेखक का तो कतैय नहीं हैं |
हम यह क्यों भूल जाते हैं की नाव के डूबने के लिए एक छोटा सा छेद ही काफी है | और लोगों की मुर्खता यह है की गहरे और गंदे पानी में नाव तो चला रहे हैं पर साथ में छेद भी कर रहे हैं ऐसे पानी की गंदगी साफ़ कैसे होगी उसी गंदगी में नाव भी डूब जाएगा और दोष पानी का होगा | समाज भी वही पानी है और वर्ग विभाजन साहित्य का वो नाव है और छेद करने वाले वो लेखक जो अपनी छोटी सोच का परिचय देते हैं |
वो लेखक हो ही नहीं सकता है जो समाज को समग्र दृष्टिकोण से ना देखे हां वह एक समाजी बम जरूर है जो केवल विनाश एक अलावा कुछ करने में सक्षम ही नहीं है और मानव कल्याण समाज की उन्नति में हैं विनाश में नहीं |

लेखक जब दिल से लिखता है तो वह लेख, कहानी, कविता सामाजिक हो जाती है जो वह स्वयं के लिए लिखता है क्यों की यहाँ भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण कार्य करता है की सभी तत्व परमाणु से बने है और उसका विनाश नहीं होता है वह तत्व या कई तत्व यानि यौगिक के रूप में सबके सामने आता है अर्थात वही सोच परमाणु है जिसका उपयोग लेखक कल्याण और विनाश दोनों के लिए कर सकता है | विनाश के लिए तभी कर सकता है जब अपनी सोच के परमाणु को दिल से निकाल दिमाग की धूर्त भट्टी में डाल कर लिखना शुरू करता है | तभी ये तेरा और मेरा शुरू होता है |
दलित वर्ग सवर्ण के अछूते सोच से पड़ेशान रहा है | और आज जब उसकी क्षमता का विकाश हुआ है तो वो भी वही अछूत की सोच को अपना रहा है अपने लिए अलग कुआँ खोद रहा है और कह रहा है की यह हमारा है इसपर और किसी का अधिकार नहीं है | अगर यह सोच है तो फिर समाज में कैसा बदलाव, इतना ही हुआ ना की गेंद एक पाले से दुसरे में पहुच रही है और वही चक्र फिर से दोहराने को तैयार है क्योकि फलां लोकार्पण में सवर्ण लेखक आया है इसलिए दलित नहीं जायेगा क्योंकि वह सवर्ण लेखक अब वो अछूत हो गया |
हम कहाँ जा रहे हैं हमारी सोच क्यों नहीं बदल रही है क्यों हम एक ही चक्र में फसे हैं दिक्कत तो यह है ना की अपनी पीठ किसी को नज़र नहीं आती है दुसरे का कूबड़ तुरंत दिख जाता है | जरूरत है अपना कूबर देखने की और एक ऐसे विचार की जो वास्तव में समाज को समाज के रूप में साहित्य को केवल साहित्य ही रहने दे किसी वर्ग विशेष के बपौटी ना बनाये |
मनोज कुमार ‘ मैथिल ‘

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