मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

आजादी


आजकल साहित्य अकादमी के पुरस्कार लौटने और पद से इस्तीफा देने का दौर चल रहा है | जो की सही नहीं है | यह अपने किये गए कार्यों लेखन का अपमान है आप के हाथ में कलम है उससे विरोध करें यह क्या पुरस्कार लौटने चले हैं यदि इतना ही है तो आज तक प्राप्त सभी पुरस्कारों को लौटा दें साथ ही साथ अपनी सभी पुस्तके भी लौटा लें क्योंकि उनमे विरोध करने की ताकत नहीं है लेखनी कुंद हो चुकी है |
आप कैसे साहित्यकार हैं जिसका हथियार कलम ना होकर राजनीती हो गयी है अब आपको अपनी कलम पर भरोषा नहीं रहा जो ऐसा करने चले हैं | एकतरफा सोच की दाद है जब आप साथ रहकर खाकर कुछ नहीं कर सके तो अलग होकर क्या ? क्या लिखना छोड़ दिया ? काम ऐसा करें जो उदाहरण बने ना की बेकार का भौंडापन |
विरोध करना है तो अपने पुरस्कार की राशि निसहाय के कलयाण में लगायें यदि आपको लगता है की कुछ गलत हो रहा है तो उस सरकार , नेता पार्टी की परिक्रमा करना बंद करें उनके किसी समारोह में आज के बाद ना जाएँ ना की कोई पद स्वीकार करें | पर ऐसा दिखावा न करें | हंसी आती है ऐसे कृत्य पर जो पंचतारा होटल में समारोह मनाने की कुवत रखते हैं क्या उन्हें देश की हालत पर तरस नहीं आता है | क्यों नहीं उनका दिल तब रोता है क्यों उनकी कलम और व्यवहार अलग-अलग बोलते हैं | क्यों इसतरह की चोचले बाजी की जरूरत पड़ती है अकादमी पुरस्कार लौटने से क्या उनको अभिव्यक्ति मिल जायेगी | ऐसा नहीं होगा यह बिलकुल गलत है | आप दुसरे के पुरस्कारों के पैसे भी लौटाने की कुवत रखते हैं उसे किसी गरीब को प्रोत्साहित करो किसी गाँव घर का भला करो बेमतलब की बातें आप जैसे रसूख वाले लोगो को शोभा नहीं देती है मैं यहाँ आपके लिए साहित्यकार का प्रोयोग नहीं कर रहा क्योंकि आप सब कलम छोड़ चुके हैं या उसकी स्याही सूख चुकी है तो जब कर्म नहीं तो कर्मकार कैसा |
आन्दोलन ऐसे नहीं होता है साहित्यकार हो साहित्यकार की भाषा बोलो क्या भौंडे राजनितिक की भाषा पकड ली है क्या जो अब तक लिखा है वो बकवास है केवल व्यापार के लिए लिखा है जो पुरस्कार को व्यापार बना दिया है उस पैसे को क्यों नहीं जनकल्याण में लगाते हो  और उन निशःय को भी एक अभिव्यक्ति देते हो | यहाँ उल्टा क्यों हो रहा है इसमें किसका हित है |
मैं तो यही मानता हूँ की यदि साहित्यकार की कलम टूट गयी तो वो मर गया और जब तक उसकी कलम है तब तक वो साहित्यकार है और उसके जैसा शक्तिशाली कोई नहीं है | पर यहाँ कलम टूट रही है उससे कुछ नहीं हो रहा है बहुत ही चिंताजनक दौर है | आप लोग आने वाले नवांकुरों के लिए क्या स्थापित करेंगे की |
कब स्वहित छोड़ सब हित की बात करेंगे साहित्यकार साहित्य की परिभाषा बदलें पर क्यों तुले हैं थोडा आत्म मंथन करें खुद ही सही गलत का अंदाजा हो जाएगा |

हे कलमवीर तुम कलम चलाओ
ना, बेमतलब का स्वांग रचाओ
सब हित सब दिश बात करो तुम
मृत भाव में प्राण भरो तुम
छोड़ कलम ना बात बताओ
हे कलम वीर तुम कलम चलाओ

हुआ पुरस्कृत कलम तुम्हारा
लेखनी को न भेजो कारा
क्या उनपर है हक़ तुम्हारा?
बस लिखकर ही, तुम मान बढाओ
हे कलमवीर तुम कलम चलाओ

कर्म तुम्हारा लेखन है
धर्म तुम्हारा लेखन है
मर्म तुम्हारा लेखन है
इसी से अपना हक़ जताओ
लिख विरोध कर फर्ज निभाओ
जनकल्याण आहुति तुम बन जाओ
हे कलम वीर तुम कलम चलाओ

मनोज कुमार 'मैथिल'
#साहित्यअकादमी

रविवार, 13 सितंबर 2015

ये मैं कह नहीं सकता संजय कश्यप

घर कपिल शास्त्री

अपने वास्ते मनोज कुमार मैथिल

जीवन की आपा-धापी में

थोड़ी सी आस बांकी

कुछ सुखी हुई गुलाब नेहा अगरवाल

लघुकथा बलात्कार

असमान को नापना ही होगा कांता रॉय

बुधवार, 9 सितंबर 2015

अब हम कैसे रहें

राम राज्य अखिलेश द्विवेदी

मन के पंख डिम्पल गौड़ अनन्या

खुशियों का आशियाना नीता कसर

गर हो इजाजत ललित कुमार मिश्र

नव निर्माण माला झा

क्या ये हाल हो गया

दिल आज उदास है कांता रॉय

लघुकथा कहानी लेखक-कपिल शास्त्री

शुक्रवार, 4 सितंबर 2015

गरीबी

अहसान फरामोश

खुशियों के सब दरवाजे

दुर्गेश्वरी बोल रही हूँ

रविवार, 23 अगस्त 2015

निः शब्द

अभिशप्त साहित्यकार




लेखकों पर यह कहावत सौ फीसदी लागू होती है खासकर नवोदितों पर और स्थापितों पर भी कहीं न कहीं “अँधा क्या चाहे दो आँख ”| मैं बात इस सन्दर्भ में कह रहा हूँ की लेखकों में छपास की इतनी अधिक लालसा होती है कि वह बिना मानदेय के कहीं भी छपने को तैयार रहते हैं यहाँ तक की पैसे देकर भी पत्र-पत्रिकाओं में छपने को लालायित रहते हैं बस कैसे भी छप जाएँ।
क्या लेखक जो लिखता है उसपर उसे विश्वास नहीं होता की लोग पसंद करेंगे या पत्र-पत्रिकाएं उन्हें छाप कर लेखकों पर अहसान करती है क्या मानदेय एक लेखक का हक नहीं है क्या साहित्य केवल मुफ्त में छपने के लिए हैं खासकर उस समय जब पत्र-पत्रिकाएं वाणिज्य रूप से चलती हैं लाखों के विज्ञापन आते हैं जब आप छापेखाने का खर्च उठा सकते हैं, कागज का खर्च उठा सकते हैं, और जिससे आपका नाम और व्यवसाय चल रहा है उस लेखक को सांकेतिक मानदेय का खर्च नागवार गुजरता है ।
क्या साहित्य सृजन करने वाले यूँ ही बंधुआ मजदूर की भाँती बेगार करते रहेंगे...| क्या केवल शील्ड से उनका पेट भरता रहेगा ......इस अर्थ तंत्र के युग में साहित्य को अर्थ से क्यों नहीं जोड़ा जा रहा है इसमें सबसे बड़ी गलती लेखकों की स्वयं है कि वो अपने को सबसे गया गुजरा समझते हैं | या उन्हें अपनी लेखनी पर विश्वास नहीं है यदि वाकई आप अच्छा लिखते हैं तो उसका छपने पर मानदेय भी मिलना चाहिए क्या ये खर्च इतना अधिक है जिसके बदौलत पत्रिकाएं निकल रही हैं उसको ही अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है ।
हम स्त्री विमर्श की बात करते हैं असल में तो बात करने वाले साहित्यकारों की स्थिति उन स्त्रीयों से भी गयी गुजरी है जो घर और बाहर काम करती हैं पर कुछ कह नहीं सकती यदि कहें तो उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है या उनके साथ बदसलूकी होती है ।
लेखक वर्ग तो इतना डरा हुआ है की वो चूं भी नहीं कर सकता है दूसरों के लिए आवाज उठाने वाले खुद के लिए कब बोलोगे | जैसे स्त्रीयों के लिए स्त्रीयां ही सबसे बड़ी बाधक हैं उनके उत्थान में वैसे ही लेखक वर्ग का भी यही हाल है |
साहित्य मुफ्त में लिखी जाने वाली चीज क्यों है? इस क्षेत्र का उत्थान कब होगा खासकर भारतीय सन्दर्भ में क्यों एक साहित्यकार इसको अपनी आजीविका का साधन नहीं बना पाता? स्वयं को समाजसेवी कहने वाले लोग, लोगों के सच्चे हितैसी खुद को बताने वाले  राजनेता भी पहले अपना घर भरते हैं फिर कहीं जाकर लोगों की बात करते हैं । लेखक वो है जो समाज की हित की उत्थान की बात करता है पर खुद का उत्थान करना उसके लिए सबसे दुरूह कार्य है । अपनी मेहनत का मेहनताना मांगने में क्या हर्ज है क्या साहित्यकार एक बधुआ मजदूर से या कहें दास से भी गया गुजरा है मुझे तो अधिकतर दास के अलावा कोई दिखाई नहीं देता है जो लिखता तो है पर रोटी के लिए खुद रोता है पर कह नहीं सकता है यह मुफ्तखोरी साहित्य की कबतक चलेगी । आज प्रकाशन का क्षेत्र काफी विस्तृत हो गया है यह केवल कहने की बात है की किताबे बिकती नहीं है अगर ऐसा है तो नित्य नए प्रकाशन कैसे उदय हो रहे है क्या सभी लोग इतने समाजसेवी हैं भूखे पेट कितने दिन राम-राम ।
यह एक गंभीर विषय है इसकी अनदेखी कई अच्छे साहित्यकारों को निगल रही है सबसे बड़ी बात जो खुद को राह नहीं दिखा सकता जो खुद के लिए आवाज नही उठा सकता है वो दूसरों की भलाई समाज सेवा जैसी बड़ी-बड़ी बातों पर कैसे मुखर लिख तो सकता है जिसपर उसका खुद विश्वास नहीं है । क्या साहित्य इसलिए जिन्दा है क्यों की मुफ्तखोरी इसपर हावी है नहीं तो और कलाओं की तरह इसका भी कब्र खुद गया होता । कदाचित नहीं क्योंकि साहित्य लिखने वालों का सम्मान राजवन्सो में ज्यादा है लोकतंत्र में यदि किसी का सबसे जयादा ह्रास हुआ है तो वो साहित्य लिखने वालों का । सबसे पहले इस छपास की प्रविती पर खुद को काबू में रखना होगा और एक शब्द ‘न’ भी सीखना होगा बिना मानदेय के और बेगारी बंद करनी होगी । क्या ऐसा हो सकता है ?
मनोज कुमार ‘मैथिल’

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

दलित लेखन –साहित्य वर्ग विभाजन औचित्य एवं उपयोगिता


साहित्य तो साहित्य है जो समाज को एक दृष्टिकोण देता है | समाज का एक दर्पण है जो समाज में हो रहे बदलाव सोच को प्रस्तुत करता है | नदियाँ चाहे कहीं से भी गुजरे मिलना उन्हें समुद्र में ही है वही सागर साहित्य है | तारे असंख्य हैं पर गगन एक है वही साहित्य है इसको नाम पे बांटना अपने दृष्टिकोण को छोटा करना है |
हम समाज की कुरीतिओं से विचलित होते हैं | और उन्ही कुरीतिओं को, साहित्य को वर्ग में विभाजित कर अंगीकार कर रहे हैं | हम कहते हैं की समाज में सभी का एक घाट होना चाहिए दलित का पानी या सवर्ण का पानी | पर क्या साहित्य को बाँट कर हम फिर से अलग अलग कुआँ नहीं खोद रहे हैं | तब समाज कैसे एक होगा जब तक हम हर प्रकार से एक ना हों |
लेखक तो लेखक होता है कोई दलित या सवर्ण नहीं | पर वर्गों में बाटना जाती प्रथा को बढ़ावा देना हैं समाज को कमजोर करना है यह काम लेखक का तो कतैय नहीं हैं |
हम यह क्यों भूल जाते हैं की नाव के डूबने के लिए एक छोटा सा छेद ही काफी है | और लोगों की मुर्खता यह है की गहरे और गंदे पानी में नाव तो चला रहे हैं पर साथ में छेद भी कर रहे हैं ऐसे पानी की गंदगी साफ़ कैसे होगी उसी गंदगी में नाव भी डूब जाएगा और दोष पानी का होगा | समाज भी वही पानी है और वर्ग विभाजन साहित्य का वो नाव है और छेद करने वाले वो लेखक जो अपनी छोटी सोच का परिचय देते हैं |
वो लेखक हो ही नहीं सकता है जो समाज को समग्र दृष्टिकोण से ना देखे हां वह एक समाजी बम जरूर है जो केवल विनाश एक अलावा कुछ करने में सक्षम ही नहीं है और मानव कल्याण समाज की उन्नति में हैं विनाश में नहीं |

लेखक जब दिल से लिखता है तो वह लेख, कहानी, कविता सामाजिक हो जाती है जो वह स्वयं के लिए लिखता है क्यों की यहाँ भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण कार्य करता है की सभी तत्व परमाणु से बने है और उसका विनाश नहीं होता है वह तत्व या कई तत्व यानि यौगिक के रूप में सबके सामने आता है अर्थात वही सोच परमाणु है जिसका उपयोग लेखक कल्याण और विनाश दोनों के लिए कर सकता है | विनाश के लिए तभी कर सकता है जब अपनी सोच के परमाणु को दिल से निकाल दिमाग की धूर्त भट्टी में डाल कर लिखना शुरू करता है | तभी ये तेरा और मेरा शुरू होता है |
दलित वर्ग सवर्ण के अछूते सोच से पड़ेशान रहा है | और आज जब उसकी क्षमता का विकाश हुआ है तो वो भी वही अछूत की सोच को अपना रहा है अपने लिए अलग कुआँ खोद रहा है और कह रहा है की यह हमारा है इसपर और किसी का अधिकार नहीं है | अगर यह सोच है तो फिर समाज में कैसा बदलाव, इतना ही हुआ ना की गेंद एक पाले से दुसरे में पहुच रही है और वही चक्र फिर से दोहराने को तैयार है क्योकि फलां लोकार्पण में सवर्ण लेखक आया है इसलिए दलित नहीं जायेगा क्योंकि वह सवर्ण लेखक अब वो अछूत हो गया |
हम कहाँ जा रहे हैं हमारी सोच क्यों नहीं बदल रही है क्यों हम एक ही चक्र में फसे हैं दिक्कत तो यह है ना की अपनी पीठ किसी को नज़र नहीं आती है दुसरे का कूबड़ तुरंत दिख जाता है | जरूरत है अपना कूबर देखने की और एक ऐसे विचार की जो वास्तव में समाज को समाज के रूप में साहित्य को केवल साहित्य ही रहने दे किसी वर्ग विशेष के बपौटी ना बनाये |
मनोज कुमार ‘ मैथिल ‘

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

भिन्न भिन्न मुंडे मतिर भिन्ना ....




यह मानव की सुलभ प्रकृति है .........जो इस प्रकृति को समझ जाता है वो सम रह पता है नहीं तो भिड़ते देर नहीं लगती ........विचार वो भी राजनैतिक आजीवन एक से कभी नहीं रहते ........... यह कई बार बिन पैंदे के लोटे जैसे होते हैं और बदलाव प्रक्रति का नियम है इसको मानना चाहिए साहत्य का स्वरुप भी हमेशा एक सा नहीं रहता समय के साथ जो चीजें अनिवार्य होती हैं वो बेमानी भी हो जाती हैं और अगर पिछले समय समाज को आज के सन्दर्भ में तौलें तो बहुत सी चीजें गलत होगीं  ।ऐसी बहसों से साहित्य को उर्जा मिलनी चाहिए पर ........कभी -कभी उर्जा का ह्रास भी होता है ........दिक्कत वहाँ शुरू होती है जब एक दायरे में बंध कर बात शुरू होती है और उस तालाब से निकलना नहीं चाहते और उसके पानी में जो जो देखने में सक्षम हैं उसी को मान लेते हैं जब तक दूसरी चीजें न देखें..........।
कदाचित अहम में सहमत या मानते हुए ही न मानना मजबूरी हो जाती है क्या एक व्यक्ति साहित्यिक पर इतना हावी हो सकता है .........यह सोचनीय विषय है ........एक साहित्यकार वो नहीं जो केवल साहित्य लिखता है वरन वो है जो सर्वांगिक दृष्टि भी रखता हो जो एक सही साहित्य को जन्म देने के लिए अति आवश्यक है यदि साहित्यकार ही अपनी दृष्टि और करनी को संकुचित कर लेगा तो समाज को वो क्या देगा ........|
 मित्रता सभी चीजों से सर्वोपरि होनी चाहिए। खासकर साहित्यिक रूप से जुड़े लोगों में तुछ राजनीती और अनर्गल बहस में अपनी उर्जा और समय नष्ट करने से अच्छा कुछ नया रचें जो समाज और साहित्य की पूंजी बन सके ........सबसे बड़ी समस्या साहित्यकारों के साथ अपने अहम् को लेकर होती है ....उसने मेरी बात क्यों नहीं मानी या मैं सबसे बड़ा हूँ मेरी समझ सर्वोच है ......एक हाथी की तरह मस्त ......पर भाई कभी-कभी चीटीं भी बहुत बड़ी बात कह जाती है ......और जब ऐसा होता है तो अहम् को ठेस पहुँचती है अरे उसने ऐसा कह दिया ........किनारा कर लेना अपने को अलग कर लेना बहुत आसान काम है। पर संगठित करना उतना ही मुश्किल ...........| सौ लोगों को छोड़ना आसान है पर एक को साथ लेकर चलना कहीं अधिक कठिन है
कुछ लोग मित्थिया प्रचार पाने के लिए सही को गलत और गलत को सही करने पर तुले रहते हैं ये नहीं है कि आप की गलत बात के समर्थक नहीं मिलेंगे एक ढूंढो हजार मिलेंगे इसका मतलब यह नहीं की गलत सही हो जाएगा .....और सही गलत । विचार करने योग बात यह होती है की आप किस दृष्टि से देखते हैं जब आप किसी नकारात्मक सोच में सकरात्मका देखने की कोशिश करोगे तो वो भी आपको मिलेगा और उसी प्रकार नकारात्मकता भी .....|
जब किसी पर दोषारोपण करते हैं तो उस समय एक बार सोचें की क्या मैं यह अपने दायरे को सिमित करके तो नहीं कर रहा हूँ कदाचित उस तथ्य को देखने का पहलु ही गलत हो एक बार दुसरे पहलु पर भी उसी गिद्ध दृष्टि से देखें जिससे अपने विचार को देखते हैं .....फिर आप सही और निष्पक्ष व्यवस्था की बात कर सकते हैं ।

मनोज कुमार ‘ मैथिल ‘

मंगलवार, 11 अगस्त 2015

खाली दिमाग


आज के समाज में नकारात्मक तत्व को लोग अपने दिल में श्रद्धा और सहानभूति के साथ जगह देते हैं | नैतिकता को इस हिसाब से देखते हैं जैसे “ये बाते हैं बातों का क्या .........”। इसके पीछे आखिर वहज क्या है ?आखिर क्या कारण है कि लोग नकारात्मक तत्वों की ओर आकर्षित होते हैं.........। लोगों की प्रकृति असुर को सुर बनाने की क्यों होती जा रही है । अब लोगों की ऐसी सोच हो रही है की ऐसे तत्वों के बारे में कहते हैं ......तुझमें रब दिखता है.......मैं क्या करूँ ........|
पहले उन लोगों का सिक्का चलता था जो नैतिकता को सर्वोपरी समझते थे और गलत लोगों को हमेशा हेय दृष्टि से देखते थे .......। अब उनका सिक्का चलता है कि उसने कितने गलत कार्य किये हैं और उससे कितना धन अर्जित किया है ..............| जहाँ लोग पहले ऐसे लोगों से सहायता तक लेना पसंद नहीं करते थे ......उनके सम्पर्क को भी असहजता से लेते थे ..........। आज वहीँ यह, सबसे गर्व का विषय होता है की फलाने बाहुबली ने हमें दावत दी है ..........।
आज रावण समाजवादी है और राम साम्राज्य वादी । चूँकि राम को अपनी पत्नी सहर्ष रावण को सौंप देनी चाहिए थी । यह समाजवाद का सबसे बड़ा उदाहरण होता...| क्योकि समाजवाद में अपना कुछ नहीं होता है सब कुछ समाज का होता है ..........| आज गलत को सजा देना नीचता की परिभाषा है............समय का तकाजा है कि गुणी को तो, घुन खाए और अवगुणी के धुन गायें ।
जीवन का अर्थ बदल चुका है। नमक की परिभाषा बदल गई है। क्योंकि वो अब मशीनों में रिफयींड होने लगा है । तो अब देश का नमक नहीं मशीन का नमक खाते हैं, तो संवेदन हीन होना लाज़मी है। क्योंकि मशीन की अपनी कोई संवेदना नहीं होती है ........हाँ बर्बरता मशीन की पहली निशानी है ........|
आप कितने प्रभावित करने वाले हैं । यह इस बात पर निर्भर करते हैं कि आपको कितने दाव-पेच आते हैं ।कदाचित समय परस्ती के कारण कोई आपकी बुराई कर दे । पर यह आपके लिए अच्छा है कल वही आपके साथ कबाब और शबाब का मजा लेता मिल जाएगा ........। यदि आप बौद्धिक रूप से कुशाग्र हैं पर दाव-पेंच में माहिर नहीं हैं तो आप सा बुद्धिहीन कोई नहीं है। लोग आपको सामने भी बेज्जत कर सकते हैं । पर अगर आप माहिर हैं तो सौ बार सोचना पडेगा कि आप उसके कितने काम आ सकते हैं आप सोने की मुर्गी बन जाते हैं ..........। परोक्ष में भी बुराई करने से कतराते हैं ।
अयूब कसाब, आफजल गुरु बने हैं ।समाजवाद तो कोई इनसे सीखे । अपने देश के लिए जान देने वालों के लिए इतनी संवेदना नहीं पर इनके लिए संवेदनाओं का अम्बार है भले ही कुछ छुपे हों ..........| यह बात भी बेनामी हो रही है जहाँ कहा गया था “लगेंगे हर बरस मेले .वतन पर मिटने वालों का बांकी यही निशां होगा ...” ।अब देश द्रोही के भी जनाजे में ज्यादा भीड़ होती है आपको टीवी पर हर मिनट उसके जागने हगने , सोने छींकने की खबर मिल जायेगी ..पर एक सडक पर तरपते व्यक्ति का क्या हुआ वह जान नहीं पाएंगे .....वैसे यह जरूरी भी नहीं ये सब गैर जरुरी चीजें है ...। २५० लोग की मौत मायने नहीं रखती पर एक फांसी फांस जरूर चुभा जाती है मानवता चीखने लगती है । हितोपदेश में एक बात कही गयी है की यदि एक व्यक्ति के त्याग से परिवार का भला हो तो उस व्यक्ति को त्यागने में कोई बुराई नहीं यदि के परिवार के त्याग से गाँव का भला हो तो उस परिवार को त्यागने में कोई बुराई नहीं .......पर आज यदि एक समाज को त्यागने से व्यक्ति का भला हो तो उस समाज को नष्ट करने में कोई बुराई नहीं है इस सिद्धांत पर चल रहे हैं वही सच्चे आदर्शवादी है आज के ........।
समय यह है कि राजनीति में पार्टी विशेष की बुराई करने पर आप पुरावाग्र्ही ही होते हैं तथाकथित लोग ही पूर्वाग्रह से मुक्त मिलेंगे वो भी वही जो यह गाते हैं कि जो तुमको हो पसंद वही बात करेंगे तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे ......। ऐसा नहीं तो दरवाजा आपको पता है ऑटोमैटिक है बंद होने के बाद खुलेगा भी नहीं ........उसमे कोई कुण्डी भी नहीं लगी जिसे आप तोड़ सकें .......।
आज स्वाभाव ऐसा है कि आपकी कोई बेज्जती नहीं कर सकता जब तक आप न चाहें .........क्योंकि आप एक मार्किट के सेल्स मेन हैं । जिसकी आज तक कोई बेज्जती नहीं कर सका चाहे बीच चौराहे पर उसके कपडे फाड़ दो फिर अगले दिन आपके दरवाजे की घंटी बजेगी ..........श्रीमान जी यह लेलो ..........हमारा तो काम है इसे बेचना कितने दिन आप ऐसा व्यवहार करेंगे कभी तो खरीद ही लोगे .......।यह है जीवन का सही ज्ञान जो सर्वव्यापी है । इसी सिद्धांत पर अनर्गल बात करने वाले चल रहे हैं ...। आज कम्पीटीसन चल रहा है की कौन कितना घोटाले बाज है । उसमे भी घोटाले में कौन घोटाला कर सकता है ।चारा से व्यापम तक और सर्वहारा से आपन तक वाह वाही आपकी ही है। क्या हुआ अगर जेल भी हो गयी ! इससे क्या फर्क पड़ता है ?कौन इतना कमा लेगा .........।बिजली की चकाचौंध में भी लाठी और लालटेन ही काम आयेंगे .........।.साईकिल से किला कैसे बनाया जाता है कोई और करके तो दिखाए .......। बांकी बातें फिर कभी .......।
मनोज कुमार ‘ मैथिल ‘