निःशब्द हुआ बैठा हूँ मैं
ना कलम चले ना लब ही हिले
सुनकर हाय वो क्रंदन
कानों में ज्यों शीशा पिघले
आखें हैं पथरायी हुई
मासूमों को देख,यूँ मरते हुए
वो चीख पुकार वो हाहाकार
बचालो हमें,ओ अब्बू ,ओ अल्लाह
कैसे हाय होंगे जो
इन नालों पर भी ना पिघले
निःशब्द हुआ बैठा हूँ मैं
ना कलम चले ना लब ही हिले
राज करोगे हा किसपर
जब ख़त्म, नस्ल हो जाएगी
क्या सोच के बैठे हो हां तुम
मौत तुम्हे ना आएगी
तुम भी होगे बाप किसी के
तुम, माँ के ही तो जने होगे
सोचो कैसा होगा जब
गोली तुम पर यूँ ही चले
निःशब्द हुआ बैठा हूँ मैं
ना कलम चले ना लब ही हिले
ओ अल्लाह क्या याद नहीं
जब बेटे को कुर्बान किया
कर जिन्दा बेटे को तूने
था बाप पे इक एहसान किया
आज भी है कई बाप खड़े
फिर क्यों नहीं आज हैं जिन्दा हुए
निःशब्द हुआ बैठा हूँ मैं
न कलम चले ना लब ही हिले
मनोज कुमार ‘मैथिल’
ना कलम चले ना लब ही हिले
सुनकर हाय वो क्रंदन
कानों में ज्यों शीशा पिघले
आखें हैं पथरायी हुई
मासूमों को देख,यूँ मरते हुए
वो चीख पुकार वो हाहाकार
बचालो हमें,ओ अब्बू ,ओ अल्लाह
कैसे हाय होंगे जो
इन नालों पर भी ना पिघले
निःशब्द हुआ बैठा हूँ मैं
ना कलम चले ना लब ही हिले
राज करोगे हा किसपर
जब ख़त्म, नस्ल हो जाएगी
क्या सोच के बैठे हो हां तुम
मौत तुम्हे ना आएगी
तुम भी होगे बाप किसी के
तुम, माँ के ही तो जने होगे
सोचो कैसा होगा जब
गोली तुम पर यूँ ही चले
निःशब्द हुआ बैठा हूँ मैं
ना कलम चले ना लब ही हिले
ओ अल्लाह क्या याद नहीं
जब बेटे को कुर्बान किया
कर जिन्दा बेटे को तूने
था बाप पे इक एहसान किया
आज भी है कई बाप खड़े
फिर क्यों नहीं आज हैं जिन्दा हुए
निःशब्द हुआ बैठा हूँ मैं
न कलम चले ना लब ही हिले
मनोज कुमार ‘मैथिल’
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