मंगलवार, 18 नवंबर 2014

महिला पर हो रहे अपराध चुनौतियाँ और समाधान परिचर्चा

हम सब साथ-साथ व् सुरभि संगोष्ठी के तत्वावधान में कल नागलोई मैट्रो स्टेशन के पास ‘महिला अपराध: घर-बाहर की चुनोतियाँ, समस्या और समाधान पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया | परिचर्चा बहुत अच्छी रही | वक्ताओं ने अपने अपने विचार रखे अधितर विचार नकारत्मक थे | पर कुछ सकारात्मक भी रहे |
मुझे पहले विषय को समझने में देर लगा क्योंकी विषय महिला अपराध था जिसका मतलब महिला होना अपराध या महिलाओं के द्वारा किया गया अपराध जिससे पुरुष वर्ग त्रस्त है और महिलाओं को ये सब करने में ( घर और बाहर उसकी चुनौतियाँ क्या क्या है ) मैंने समझा | शायद यह मेरी अल्प बुधि के कारण हो | पर महिलाओं के साथ हो रहे अपराध से के सन्दर्भ में है यह नहीं समझ पाया |
खैर सबकी अपनी अपनी समझ होती है चलिए फिर आते हैं मुद्दे पर| मुद्दा था महिलाओं के साथ हो रहे अपराध जाहिर सी बात है की महिलाएं इन सबसे ज्यादा प्रभावित हैं और वो इस विषय पर अच्छी पकड़ रखती हैं | वैसा ही हुआ ( पुरुष अपने द्वारा किये गए अपराध थोड़े ही गिनाएंगे) महिला वक्ता ज्यादा थीं | पुरुष वर्ग में दो चार थे पर वो भी गिनाने तो चले पर गिनती भूल गए | परन्तु महिलाएं भी अधिकतर हो रहे अपराध के अनुभव से वंचित लगीं | परन्तु अल्पना जी जैसी वक्ता ने महिलाओं की गरिमा को संभाल लिया | और एक सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया |
कई वक्ताओं के केंद्र में २०१२ का निर्भया कांड अपनी बात के समर्थन में था की महिलाओं के साथ हो रहा अपराध और उस समय हुए जनांदोलन |
वास्तव में वो रोंगटे खरे कर देने वाला वाकया था पर मुझे आश्चर्य इस बात पर हुआ की महिलाएं और पुरुष वक्ताओं को दो साल पहले हुई घटना तो याद रही और उसी तरह की हाल ही में लगभग १० दिन पहले हुई वैसी घटना याद नहीं थी | हाल में हुए वाकये पर क्यों नहीं जनांदोलन हुआ | क्यों नहीं लोगों का खून खौला जबकि अभी तो इतनी ठण्ड भी नहीं पड़ी है की खून जम जाये | या मोमबतियां बननी बंद हो गयी हैं की जली नहीं |
अधितर वक्ताओं के पास रटे रटाये शब्द थे अपनी सोच कुछ नहीं थी | तो फिर अपराध कैसे नहीं बढेंगे | यदि हर इसतरह के वाकये पर जनांदोलन हो तो ये अपराध रुकेगा |
दूसरी बात सभी का जोर इस बात पर था की कानून को सख्ती से लागू करना चाहिए | यानी सभी ने ये मान लिया था की हम इन्सान नहीं जानवर हैं जो बिना कानून के पिंजरे में रहे सुधर ही नहीं सकते |
एक बात और आजादी का मतलब स्वकछ्न्द्ता तो नहीं | हमे अपनी सीमाओं का तो ख्याल रखना पड़ेगा | चाहे वो पुरुष हो या स्त्री | हमने आजादी को स्वकछ्न्द्ता से जोड़ दिया है नैतिकता का ह्रास हुआ है | आज अगर दो भाई बहन भी साथ चल रहे हों तो लोग गलत सोचते हैं | देखिये हमारी सोच कहाँ जा रही है |
विनोद बब्बर जी ने एक बात बहुत अच्छी कही की जिसके ऊपर जितनी ज्यादा जिम्मेवारी होती है उसे उतनी ही चुनौतियों का सामना करना पड़ता है | और महिलाओं पर घर और समाज दोनों की जिमेवारियां है आज के समय में | तो चुनौतियाँ भी जयादा होंगी | पर उनका समाधान नकारात्मक सोच से तो नहीं हो सकता है ना | इसके लिए सकारात्मक होना बहुत जरूरी है |
कुल मिलकर परिचर्चा कुछ समस्याओं को उठाने में कामयाब रही | समाधान भी धीरे धीरे निकल जायेगा यदि घटनाओं को लेकर सजग रहें तो | इस तरह की आयोजन होते रहने चाहिए|
किशोर जी आपकी इस सोच(कार्यक्रम) के लिए साधुवाद |
मनोज कुमार ‘मैथिल’

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