सोमवार, 29 दिसंबर 2014

नव वर्ष काव्य गोष्ठी २०१५



साहित्य नभ द्वारा नववर्ष की पूर्व संध्या पर २८-१२-२०१४ को नववर्ष काव्य गोष्ठी का आयोजन युवा आलोचक संदीप तोमर की अध्यक्षता में नांगलोई दिल्ली में किया गया | आयोजन की सफलता के लिए साहित्य नभ परिवार सभी को हार्दिक धन्यवाद देता है | गोष्ठी की शुरुआत कवि अखिलेश द्विवेदी अकेला की राम वदना से हुई जिसमे दुबारा राम राज्य की कामना की गयी | अखिलेश जी ने अटल बिहारी वाजपेयी जी के रचना मैं गीत नहीं गात हूँ तथा मैं गीत नया गाता हूँ सुना कर साहित्य नभ की ओर से जन्मदिन की बधाई दी | मनोज कुमार मैथिल ने पसीने से तरबतर जाड़े में... एवं हाल ही में हुए पेशावर कांड पर निः शब्द हुआ बैठा हूँ मैं... का पाठ किया जिसने लोगों को काफी प्रभावित किया | हमारे बीच गाज़ियाबाद से आयीं कवयित्री सोनाली मिश्रा जी की कविता जरा बीडी तो जलाने दो... ने सभी को मन्त्र मुग्ध कर दिया | अमित कुमार की कविता गहरे समुन्दर का किनारा कौन बनता है आज के दौर में संबंधो का अच्छा विश्लेषण था | ललित कुमार मिश्र ने देश के लिए नौजवानों का आह्वाहन किया तथा श्रृंगार रस के रूप में उनका  कहने के लिए भी इजाजत मांगना वाकई काबिले तारीफ था | हमारे बीच मौजूद युवा गज़लकार इरफ़ान राही ने अपने  नए रूप से हास्य कविता पढ़कर परिचित कराया | इस कार्यक्रम के अध्यक्ष संदीप तोमर जी ने भी अपनी कविता के ज़रिये किताबों की होती दैनिये स्थिति का विश्लेषण किया | हमारे मुख्या अतिथि इंदरजीत गहलोत जी ने अपने विचार रखे एवं साहित्य नभ को इसतरह के आयोजन आगे भी करते रहने को कहा और बताया की देश के विकास में साहित्य जगत का कितना योगदान है | साहित्य नभ के सचिव अखिलेश द्विवेदी अकेला जी ने सभी का धन्यवाद किया विशेष रूप से इस काव्यगोष्ठी के संयोजिका सोनाली मिश्रा जी का |

मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

लाइव न्यूज़


“हेलो दोस्तों आप कैसे हैं, अभी मैं ट्विटर पर आपको लाइव दुर्घटना का ब्यौरा देने जा रही हूँ |”
“सांय ७.३० मिनट एक कार को ट्रक ने मेरे घर के सामने वाली सड़क पर टक्कर मारी | दोस्तों बहुत तेज़ आवाज़ हुई है | पहली बार ऐसा भयानक हादसा देखा है|”
“७.४० कार में से धुयाँ निकल रहा है |लोगों की भीड़ जमा होने लगी है | अभी पुलिस वाले नहीं आये हैं |”
“७.४५ मैं बहुत रोमांचित हो रही हूँ आपको लाइव समाचार बताते हुए |
बांकी समाचार थोड़ी देर में देती हूँ मेरा डोरवेल किसी ने बजाय है... |"
"अरे, आती हूँ इतने रोमांचक माहौल में कौन डिस्टर्ब करने आ गया | अभी मुझे फेसबुक, व्हाटएप्स पर भी लोगों को बताना है..| आती हूँ.. क्या जल्दी है |"
दरवाजा खोलते ही, “मैडम आपके पति का एक्सीडेंट हो ग......या है| आपके घर के सामने जो अभी कार ट्रक से टकराई है वो आपके पति की ही थी |”
मनोज कुमार ‘मैथिल’

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

निःशब्द हुआ बैठा हूँ मैं

निःशब्द हुआ बैठा हूँ मैं
ना कलम चले ना लब ही हिले
सुनकर हाय वो क्रंदन
कानों में ज्यों शीशा पिघले
आखें हैं पथरायी हुई
मासूमों को देख,यूँ मरते हुए
वो चीख पुकार वो हाहाकार
बचालो हमें,ओ अब्बू ,ओ अल्लाह
कैसे हाय होंगे जो
इन नालों पर भी ना पिघले
निःशब्द हुआ बैठा हूँ मैं
ना कलम चले ना लब ही हिले

राज करोगे हा किसपर
जब ख़त्म, नस्ल हो जाएगी
क्या सोच के बैठे हो हां तुम
मौत तुम्हे ना आएगी
तुम भी होगे बाप किसी के
तुम, माँ के ही तो जने होगे
सोचो कैसा होगा जब
गोली तुम पर यूँ ही चले
निःशब्द हुआ बैठा हूँ मैं
ना कलम चले ना लब ही हिले
ओ अल्लाह क्या याद नहीं
जब बेटे को कुर्बान किया
कर जिन्दा बेटे को तूने
था बाप पे इक एहसान किया
आज भी है कई बाप खड़े
फिर क्यों नहीं आज हैं जिन्दा हुए
निःशब्द हुआ बैठा हूँ मैं
न कलम चले ना लब ही हिले
मनोज कुमार ‘मैथिल’

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

महिला पर हो रहे अपराध चुनौतियाँ और समाधान परिचर्चा

हम सब साथ-साथ व् सुरभि संगोष्ठी के तत्वावधान में कल नागलोई मैट्रो स्टेशन के पास ‘महिला अपराध: घर-बाहर की चुनोतियाँ, समस्या और समाधान पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया | परिचर्चा बहुत अच्छी रही | वक्ताओं ने अपने अपने विचार रखे अधितर विचार नकारत्मक थे | पर कुछ सकारात्मक भी रहे |
मुझे पहले विषय को समझने में देर लगा क्योंकी विषय महिला अपराध था जिसका मतलब महिला होना अपराध या महिलाओं के द्वारा किया गया अपराध जिससे पुरुष वर्ग त्रस्त है और महिलाओं को ये सब करने में ( घर और बाहर उसकी चुनौतियाँ क्या क्या है ) मैंने समझा | शायद यह मेरी अल्प बुधि के कारण हो | पर महिलाओं के साथ हो रहे अपराध से के सन्दर्भ में है यह नहीं समझ पाया |
खैर सबकी अपनी अपनी समझ होती है चलिए फिर आते हैं मुद्दे पर| मुद्दा था महिलाओं के साथ हो रहे अपराध जाहिर सी बात है की महिलाएं इन सबसे ज्यादा प्रभावित हैं और वो इस विषय पर अच्छी पकड़ रखती हैं | वैसा ही हुआ ( पुरुष अपने द्वारा किये गए अपराध थोड़े ही गिनाएंगे) महिला वक्ता ज्यादा थीं | पुरुष वर्ग में दो चार थे पर वो भी गिनाने तो चले पर गिनती भूल गए | परन्तु महिलाएं भी अधिकतर हो रहे अपराध के अनुभव से वंचित लगीं | परन्तु अल्पना जी जैसी वक्ता ने महिलाओं की गरिमा को संभाल लिया | और एक सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया |
कई वक्ताओं के केंद्र में २०१२ का निर्भया कांड अपनी बात के समर्थन में था की महिलाओं के साथ हो रहा अपराध और उस समय हुए जनांदोलन |
वास्तव में वो रोंगटे खरे कर देने वाला वाकया था पर मुझे आश्चर्य इस बात पर हुआ की महिलाएं और पुरुष वक्ताओं को दो साल पहले हुई घटना तो याद रही और उसी तरह की हाल ही में लगभग १० दिन पहले हुई वैसी घटना याद नहीं थी | हाल में हुए वाकये पर क्यों नहीं जनांदोलन हुआ | क्यों नहीं लोगों का खून खौला जबकि अभी तो इतनी ठण्ड भी नहीं पड़ी है की खून जम जाये | या मोमबतियां बननी बंद हो गयी हैं की जली नहीं |
अधितर वक्ताओं के पास रटे रटाये शब्द थे अपनी सोच कुछ नहीं थी | तो फिर अपराध कैसे नहीं बढेंगे | यदि हर इसतरह के वाकये पर जनांदोलन हो तो ये अपराध रुकेगा |
दूसरी बात सभी का जोर इस बात पर था की कानून को सख्ती से लागू करना चाहिए | यानी सभी ने ये मान लिया था की हम इन्सान नहीं जानवर हैं जो बिना कानून के पिंजरे में रहे सुधर ही नहीं सकते |
एक बात और आजादी का मतलब स्वकछ्न्द्ता तो नहीं | हमे अपनी सीमाओं का तो ख्याल रखना पड़ेगा | चाहे वो पुरुष हो या स्त्री | हमने आजादी को स्वकछ्न्द्ता से जोड़ दिया है नैतिकता का ह्रास हुआ है | आज अगर दो भाई बहन भी साथ चल रहे हों तो लोग गलत सोचते हैं | देखिये हमारी सोच कहाँ जा रही है |
विनोद बब्बर जी ने एक बात बहुत अच्छी कही की जिसके ऊपर जितनी ज्यादा जिम्मेवारी होती है उसे उतनी ही चुनौतियों का सामना करना पड़ता है | और महिलाओं पर घर और समाज दोनों की जिमेवारियां है आज के समय में | तो चुनौतियाँ भी जयादा होंगी | पर उनका समाधान नकारात्मक सोच से तो नहीं हो सकता है ना | इसके लिए सकारात्मक होना बहुत जरूरी है |
कुल मिलकर परिचर्चा कुछ समस्याओं को उठाने में कामयाब रही | समाधान भी धीरे धीरे निकल जायेगा यदि घटनाओं को लेकर सजग रहें तो | इस तरह की आयोजन होते रहने चाहिए|
किशोर जी आपकी इस सोच(कार्यक्रम) के लिए साधुवाद |
मनोज कुमार ‘मैथिल’

बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

देख बदलते लोग

दिल जलता है मेरा
देख बदलते लोग
हिज्र की बात नहीं
बेबात फिसलते लोग
दिल जलता है मेरा
देख बदलते लोग

बसे जो दिल में
बना के आशियाँ.....
अब आंगन में भी,
नहीं ठहरते लोग
दिल जलता है मेरा
देख बदलते लोग

छांव पीपल के तले
दुपहर कटती रही
रात होने पे वहीँ
क्यों डरते लोग
दिल जलता है मेरा
देख बदलते लोग

ना हम कह ना सके
सबके घाव भरते रहे
मांगे जो मरहम हम
तो क्यों ना कहते लोग
दिल जलता है मेरा
देख बदलते लोग

- मनोज कुमार ‘मैथिल’

मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

सोचा है तुमने

ज़िन्दगी कितनी  हसीन है
खट्टी मीठी नमकीन है
सोचा  है तुमने
खुआब देखो रोका है किसने
पर उसे कब पूरा करोगे
सोचा  है तुमने
सैलाब मे बह गया  तिनका-तिनका
बसेगा आशियाना किनका-किनका
सोचा  है तुमने
शब्द कि जादूगरी आती नहीं
राजनैतिक समझदारी भाती नहि
फिर बदलोगे कैसे जमाना
सोचा  है तुमने
बाहुबली तुम नहीं हो
धन के अली तुम नहीं हो
फिर तुम लड़ोगे कैसे
सोचा है तुमने
शब सोये सुबह उठे
उठकर चलना कब सीखोगे
सोच है तुमने
खड़े चौराहे पर
किसी साथी के इंतज़ार मे
हाथ बढ़ाना कब सीखोगे
सोच है तुमने
जिंदगी कितनी हसीन है
खट्टी मीठी नमकीन है
सोचा है तुमने

मनोज कुमार 'मैथिल'