चल रहा हूँ मैं क्षितिज की ओर यारों
सोच कर की ये,
मिटा दूंगा मैं दूरी धरती और आसमां की
कदम बढ़ते गए पर फासले अब भी वहीँ हैं
हौसले और भी मेरे बुलंद हो गए हैं
सोच कर की ये,
क्षितिज अब भी मुझको दिख रहा है
मनोज कुमार मैथिल
सोच कर की ये,
मिटा दूंगा मैं दूरी धरती और आसमां की
कदम बढ़ते गए पर फासले अब भी वहीँ हैं
हौसले और भी मेरे बुलंद हो गए हैं
सोच कर की ये,
क्षितिज अब भी मुझको दिख रहा है
मनोज कुमार मैथिल
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