मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

चल रहा हूँ

चल रहा हूँ मैं क्षितिज की ओर यारों
सोच कर की ये,
मिटा दूंगा मैं दूरी धरती और आसमां की
कदम बढ़ते गए पर फासले अब भी वहीँ हैं
हौसले और भी मेरे बुलंद हो गए हैं
सोच कर की ये,
क्षितिज अब भी मुझको दिख रहा है

   मनोज कुमार मैथिल

कुछ अजब घुटन सी होती है

कुछ अजब घुटन सी होती है
जीवन में चुभन सी होती है
सपनों की नाव में छेद बड़ा
हिचकोले रेत पे लेती है
कल कल कल कल
हर हर हर हर
पल पल पल पल
चल चल चल चल
कुछ आवाज सुनाई देती है
पर घने तम के जंगलों में
कब राह दिखाई देती है
बसंत भी पतझड़ दिखता है
पत्थर पे लिखा भी मिटता है
साफ़ आसमां से जब,
ओलों की बारिश होती है
चिलचिलाती धूप में भी
कुछ कपन सी होती है
कुछ अजब घुटन सी होती है

वो दिवाकर दंभ भरे
दुनिया को रोशन जो करे
गहरे सागर में हाँ कब
रौशनी उसकी होती है
कुछ अजब घुटन सी होती है

           मनोज कुमार 'मैथिल '

जुल्फों को यूँ ना सवारों

जुल्फों को यूँ ना सवारों
किसी का दिल मचलता है
नजरों को यूँ ना झुकालो
किसी का दम निकलता है
ये लट भी हो गए हैं बेइमा
आ जातें हैं रुखसार पर
रोक लगाने को दीदार पर
यूँ ना पहरे लगा लो
इतना तो हक़ बनता है
जुल्फों को यूँ ना सवारों
किसी का दिल मचलता है

                  मनोज   कुमार  'मैथिल '