मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

हे प्रिये

हे प्रिये
तुम पर लिखूं क्या 
छंद दोहे गीत को 
वर्णों में, वर्णन नहीं तो
शब्दों में कैसे गढ़ूं मैं,  मीत को 
शब्द की सरिता बहा दूँ 
चीर सागर तक तो मैं 

रत्नाकर के रत्नों में कोई नहीं
जो तेरी उपमा बन सके
हे प्रिये ......
अम्बर भी तेरे आगे
झुक कर चल रहा
वो कुसुम केशु में  तेरे
सजने को, मचल रहा
इक कल्प भी  है अल्प 
तेरी प्रसंशा के लिए
तुझको ना हो, भान 
पर ये प्राण 
अनुकम्पा में तेरी चल रहे 
हे प्रिये.....
ब्रह्माण्ड में,
है अगर कोई रती 
वो भी तेरे सम्मुख पानी मांगती
 निष्प्राण हो जाये चराचर बिन तेरे 
हे प्रिये ....
  मनोज कुमार 'मैथिल'

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