सोमवार, 31 दिसंबर 2012

मै दामनी

मै दामनी
चंचल चतुर कामनी
ओ धरा तेरे कुपुत्रों
ने क्या करा
होती रही तू कलंकित
क्यों नहीं तूं फट पड़ी
जब थी मैं लुट रही
कैसी तू निर्लज हुई
जब लिपटे थे अजगर कई
क्यों कहूँ  अजगर उन्हें
उनकी कोई  उपमा  नहीं
मैं दामनी
चंचल चतुर कामनी
अंक तेरा रंक हुआ
चन्दन भी अब पंक हुआ
आ रही दुर्गन्ध है
मदिरा बना मकरंद है 
कैसे कहूँ ए धरा शौभग्यनि
मैं दामनी
चंचल चतुर कामनी
भस्म करके काम को
शिव ने दिया वरदान जो
अभिशाप अब वो बन गया
कामांधों को है जन गया
हे महेश्वर
कृपा करो अब ये बता कर
क्यों नहीं भृकुटी तनी
मैं दामनी
चंचल चतुर कामनी  

मनोज कुमार 'मैथिल'



मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

हे प्रिये

हे प्रिये
तुम पर लिखूं क्या 
छंद दोहे गीत को 
वर्णों में, वर्णन नहीं तो
शब्दों में कैसे गढ़ूं मैं,  मीत को 
शब्द की सरिता बहा दूँ 
चीर सागर तक तो मैं 

रत्नाकर के रत्नों में कोई नहीं
जो तेरी उपमा बन सके
हे प्रिये ......
अम्बर भी तेरे आगे
झुक कर चल रहा
वो कुसुम केशु में  तेरे
सजने को, मचल रहा
इक कल्प भी  है अल्प 
तेरी प्रसंशा के लिए
तुझको ना हो, भान 
पर ये प्राण 
अनुकम्पा में तेरी चल रहे 
हे प्रिये.....
ब्रह्माण्ड में,
है अगर कोई रती 
वो भी तेरे सम्मुख पानी मांगती
 निष्प्राण हो जाये चराचर बिन तेरे 
हे प्रिये ....
  मनोज कुमार 'मैथिल'

बुधवार, 18 जनवरी 2012

साँझ सवेरे ऐ दिल मेरे

साँझ सवेरे ऐ दिल मेरे
ढूंढ़ रहा हूँ इक पल अपना
खोया यहाँ पर गया कहाँ पर
मिले अगर तो ढूंढ़ के रखना
उस पल में बस मैं ही मिलूँगा
और मिलेगा मेरा सपना
सुबह की खिलती धूप मिलेगी
दुपहर भी अंगराई वाली
शाम जहाँ अठखेलियाँ करती
और कहे न थकने वाली
थके हुए पल कभी न तकना
साँझ सवेरे ऐ दिल मेरे ...

चाँद की शीतलता जहाँ हो
चांदनी ओढ़ निशा शर्माए
प्रणय पर्व के उत्सव में
गुण गुण गुण गुंजन गाए
तान वहां पर बांसुरी छेड़े
नृत्य मनोहर करता झरना
सांझ सवेरे ऐ दिल मेरे ...

मनोज कुमार मैथिल
 





शनिवार, 14 जनवरी 2012

आयी होली आयी

आयी होली आयी
बजने लगे
उमंग के साज
इन्द्रधनुषीय रंगों से
रंग दो
पिया आज

न भाए रंग
अबीर का
न सोहे
रंग गुलाल
नेह के रंगों से पिया
रंग दो
चुनरिया लाल

न जानूँ बात
सुरों की
है अनजानी
हर ताल
होली के मद में नाचूंगी
तुम संग
हो बेसुध बिन साज

बाट तुम्हारी
मैं जोहुंगी
नयन बिछाए
हर राह
भूल न जाना
बात मिलन की
आई होली आज

- दीपा जोशी

आशाओं के दीप

साँझ ढले मैं आशाओं के दीप जलाया करता हूँ..

थाम उजाले का दामन
मन ने कुछ सपने देखे थे,
कुछ कलियों की सीपों में
कुछ मोती पुष्प सरीखे थे,
मन उड़ बैठा था पंछी सा
तोड़ समझ की हर बेड़ी,
आशाओं की मदिरा से
अमृत के प्याले फ़ीके थे,
उस छोर सभी जो देखे थे वह दृश्य बनाया करता हूँ
साँझ ढले मैं आशाओं के दीप जलाया करता हूँ..

धूप बढ़ी फिर
स्वप्न सेज की सुँदरता मुझसे रूठी,
राहों का हर काँटा बोला
"कटुता सच्ची मधुता झूठी"
मन बोल उठा बैठे रहने से कब सुख किसने पाया है,
हँसी ठिठोली करता सुख उसने यह स्वाँग रचाया है,
हर पल तन की पीड़ा सेहता मैं हर्ष मनाया करता हूँ
साँझ ढले मैं आशाओं के दीप जलाया करता हूँ..

कुछ दूर मैं शायद चल बैठा
अब दूर वह सपने दिखते हैं,
वृद उजाला सेहमा सा
सँध्या के आरोही साँसें भरतें हैं,
कुछ रही अधूरी आशायें फिर भी मैं चलता रहता हूँ
मन के कल्पित स्वपनों का स्वर इस पथ को अर्पित करता हूँ,
जिस पहर उजाला सोता है मैं आस जगाया करता हूँ
साँझ ढले मैं आशाओं के दीप जलाया करता हूँ...

- परिमल श्रीवास्तव