मंगलवार, 19 जुलाई 2011

कुछ कहना चाहता हूँ

सभी कुछ न कुछ कहना चाहते हैं । पर कैसे कहें इसी सोच में समय गुजर जाता है । एक प्रेमी अपनी प्रेमिका से कुछ कहना चाहता है यदपि वो उसकी पत्नी बन जाती है पर जीवन भर वो कुछ कह नहीं पता है ।
एक कर्मचारी अपने अधिकारी से कुछ कहना चाहता है पर वो पुरे कार्यकाल में कुछ कह नहीं पाता है। जनाब ऐसे कई उदहारण हैं कि जहाँ कुछ कोई कहना चाहता है, पर कह नहीं पता है। आखिर क्या कारण है जो कोई कुछ कह नहीं पता है।
वैसे यह कुछ बड़े काम कि चीज है । इस कुछ के जरिये बहुत कुछ काम हो जाता है कभी कुछ न कह पाने के चक्कर में कई बार सब कुछ खो भी देतें हैं। 'कुछ' को इतना तुच्छ मत समझिये गा। इससे डरना सीखिए या कुछ कहना सीखिए ।
एक बानगी देखिये -
फोन कि घंटी बजती है हेल्लो श्याम यार क्या कर रहा है तू, अभी तक मेरा काम नहीं किया । यार सही में बड़ा ही आलसी आदमी है तू।
बस यार क्या बताऊँ इधर समय ही नहीं निकाल पाया(तू पहले कुछ पैसे तो दे जिससे मैं तेरा काम शुरू कर करूँ बिना पैसे कैसे काम होगा )जल्दी ही तेरा काम ख़त्म हो जायेगा। बस कुछ दिन और रुक जा।

यहाँ श्याम कहना कुछ चाहता था पर उसने कहा कुछ शायद यदि वह कुछ कह पता तो दोनों का काम हो जाता या नहीं भी होता तो दिल पर दोस्ती का बोझ तो नहीं रहता।
ऐसे बहुत कुछ है जहाँ कुछ, सब कुछ होता है । कभी झिझक में कभी किसी और कारण से कुछ कह नही पता है।
अजी अगर कोई कुछ कहने कि हिम्मत रखता है तो उसे सुनता कौन है । वैसे से भी ध्वनि प्रदुषण बढ़ रहा है ऐसे में बहरा होना तो लाज़मी ही है।
आज कल तो मिडिया के शोर में सरकार बहरी है । महंगाई इतनी है कि इसके अलावा 'कुछ' सुनाई ही नही देता है ।
इसमें अगर कोई कुछ कहे तो कैसे कोई कुछ सुन पाए गा ।
भाई हम तो बस इतना ही कह पाएंगे कि
कुछ कि माया कुछ ही जाने
चलती दुनिया कुछ के बहाने
कुछ ना सुनते बड़े सयाने
कुछ कहने को बने तराने
फिर भी कुछ ना कह पाने
कुछ कि माया कुछ ही जाने

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