आज बहुत दिनों के बाद कुछ लिखने के लिए बैठा हूँ । लिखने को और कहने को बहुत कुछ है पर कहाँ से शुरू करूँ यही समझ नहीं आ रहा है । आज की व्यस्त जिन्दगी में लोगों के पास अपने लिए ही समय नहीं है तो परिवार के लिए कहाँ से आएगा । लोग वास्तविक जिन्दगी ही जीना भूल गए हैं ।
तकनीक ने दुनिया को इतना छोटा कर दिया है की आज दूरियां मिट गयी हैं । आज दफ्तर और घर में अंतर ही नहीं रहा । हाँ अगर दूरियां बढ़ी हैं तो बस संबंधों में बढ़ी हैं । संबंधों की वास्तविकता कही खो गयी है। रह गया है तो मुखोटा सिर्फ।
आज लोग बिज़नस पार्टिओं में जाते हैं घरेलु कार्यक्रमों में भाग लेने की फुर्सत नहीं है। एक दुसरे से मिलते - जुलते हैं बातें करते हैं पर कहीं खोये रहते हैं जहाँ उनके अलावा किसी और को जाने या भाग लेने की इजाजत नहीं होती है।
आज प्रेम या आपसी सम्बन्ध केवल आर्थिक तराजू पर तोले जाते हैं । हो भी क्यों ना बिना अर्थ के जीवन को निरस्त की ओर(सम्पनता) नहीं लाया जा सकता है । और समाज में उसी को पूछा जाता है जो ज्यादा से ज्यादा दिखावा करे । वास्तव में मशीनी युग में मशीनी जीवन जी रहे हैं लोग । जहाँ है तो सबकुछ पर स्वाभाविक कुछ भी नहीं। जहाँ एक इमानदार आदमी भी भ्रष्ट होने पर मजबूर है। जहाँ केवल दो ही प्रकार के लोग है एक क्रेता और दूसरा विक्रेता । और कोई दूसरा सम्बन्ध हो ही नहीं सकता है।
आज जहाँ साहित्य की बात है तो वह किताबों में धुल फांक रहा है । आज लिखा जाने वाला साहित्य केवल लिखने तक ही सिमित रह गया है पाठक रेगिस्तान में पानी की बूंद की तरह हैं । आज मुश्किल से किसी घर में कोई साहित्यिक पुस्तक मिल जाए यदि मिल भी गयी तो बिना झाड़े आप नाम भी नहीं पढ़ सकते हैं। पत्रिकाओं में भी साहित्य केवल समीक्षाओं तक सिमट कर रह गयी है वो भी ऐसी जहाँ समीक्षा करने वाला यह चाहता है की उसकी पुस्तक की भी ऐसी ही समीक्षा हो । पुस्तक केवल विद्यालय और विश्वविद्यालय तक सिमट कर रह गयी हैं।
साहित्य हमें मानव बनकर जीना सिखाती है । यदि साहित्य नहीं है तो मानव भी नहीं हो सकता है ।
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