रविवार, 3 जनवरी 2016

यह सदी अब किशोर हो गया

यह सदी अब किशोर हो गया
पन्द्रह से सोलह की ओर हो गया
षोडष की मादकता में भीगा
बहक जाने का शोर हो गया
कानों कान जब खबर फैली
मन कैसा चितचोर हो गया
रस्सी पर चलती पूछे बाला
क्या मेरा भी नया भोर हो गया
फूटपाथ पर सोना मत
कुचले जाओगे बारम्बार
कानून तो है ही गांधारी
मानवहीन अमीरों का कार हो गया
अच्छे दिन चुनावी जुमला था
जनलोकपाल पर पाला पड़ गया
झाड़ू लालटेन साथ हो लिए
आप भ्रष्टों का बाप हो गया
यह उम्र हो गयी अपने मन की
सोच हुई है कितनी दुर्बल
नैतिकता का पाठ छोडकर
काम शास्त्र में खो गया
यह सदी अब किशोर हो गया
पन्द्रह से सोलह की ओर हो गया
‪#‎मनोजकुमारमैथिल‬

नया साल २०१६


दोंस्तों क्या कर रहे हैं ? मैंने भी कैसा प्रश्न पूछ दिया यही सोच रहे हैं ना आप कि नये साल का जश्न माना रहे हैं नया वर्ष शुरू हुआ ही और आप पूछ रहे है क्या कर रहे हैं ? सच जब मन प्रसन्न हो और उस समय कोई प्रश्न पूछ बैठे तो मन खिन्न हो जाता है । चलिए जवाब बाद में दीजियेगा पहले मेरी तरफ से नए साल की बधाई स्वीकार करें ....अजी रुकिए युहीं आपको भी.. कह कर ना निकल जाईये | दो मिनट तो रुकिए वर्ष के पहले दिन की यह पहली शाम है । कुछ गुफ्फ्तगू हो जाए ...
आज हमने एक मजदूर जिसका नाम रामदीन है कहा, “भाई नया साल मुबारक हो ।“ वो तमतमा गया ।
बोला “ भाई साहब क्यों आप मुझे तमाचा मार रहे हैं मैंने आपका क्या बिगाड़ा है ... ।
मैं कहा, “बड़े अजीब हो मैंने तुम्हें बधाई दी और तुम उसे तमाचा कह रहे हो ।”
उसने कहा की तमाचा केवल हाथ से थोड़े ही मारा जाता है बातों का तमाचा बहुत बड़ा घाव करता है हमारे लिए तो नया दिन नहीं होता तो साल क्या है रोज रोटी की जदोजहद । मजदूरी मिल जाए तो बोतल के साथ फिर पुराना हो जाता है ।
मैंने कहा, “यही तो है की खाने को रोटी ना हो पर पीने को दारु चाहिए ..।“
“साहब यह दिल्ली की सर्दी है अगर बोतल ना पकड़ी तो एक रात काटना दूभर हो जाएगा ...। यहाँ लोग बिना काम के अपनों को नहीं पूछते तो हम जैसो को कौन पूछेगा ?”
मैंने बात को ना बढ़ाते हुए कहा ठीक है भाई अभी थोडा जल्दी में हूँ फिर बात करता हूँ और आगे बढ़ गया ।
रास्ते में चड्डा साहब अपनी नई कार में दिखे तो मैंने हाथ हिलाते हुए नए साल की बधाई दी । मेरा कहना था की उनकी कार एक झटके से रुकी पहिया दूर तक निशान बना रहा था । मैं घबरा गया की कार के आगे कुछ ना होते हुई भी उन्होंने इतना तेज ब्रेक क्यों मारा । मैं कुछ सोचता इससे पहले ही वो मेरे सामने ।
मुझे घूरते हुए बोले “भाई मैंने तेरा क्या बिगाड़ा है जो इत्ती खतरनाक बात कर रहा है ।”
मैंने कहा चड्डा साहब मैंने तो आपको मुबारकबाद दी है और आप...। मेरी बात काटते हुए बोले भाई और क्या बोलूँ चार कार होते हुए भी मुझे यह पाँचवी कार लेनी पड़ गयी । पहले ही कम खर्चे थे जो सरकार के नए नियम में एक और जोड़ दिया ।
मैंने कहा यह तो सभी के भलाई के लिए बनाया गया नियम है । प्रदूषण कम होगा हवा साफ़ होगी ।
अजी कहाँ की भलाई...इतने तो खर्चे बढ़ा दिए बिना कार की तो जिन्दगी ही बेकार है और प्रदूषण तो आप जैसे बधाई देकर फैला रहे हैं आखिर हमें भी तो जीने का हक है हमारे लिए क्या नया है कार का और घरबार का दोनों का ही खर्चा बढ़ता जा रहा है और आप बधाई देकर जले पर नमक छिडक रहे हो ....। मैंने वहां से निकलना बेहतर समझा ।
आगे बढ़ा तो मास्टर जी मिल गये मैं ने उनसे कहा तो बेचारे बगले झांकते हुए बोले भाई मैं आपको थोडा ज्ञानी समझता था पर आप तो ....। मैंने बात बीच में ही काटते हुए कहा , “क्या हुआ मैंने ऐसी क्या बात कर दी ।”
तो उन्होंने शिक्षा निति की बखिया उधेड़ कर रख दिया और आगे बोले यदि ऐसा ही नया साल होना है तो फिर बधाई किस बात की और आप का इसतरह बधाई देना किसी बेबकूफाना हरकत से कम है ..अंग्रेज चले गए पर अपनी अंग्रेजी का पिछवाडा यहीं छोड़ गये तबला बजाने को ...। उनको कुछ कह पाता इससे पहले वो बुदबुदाते निकल लिए ।
मैं वापस घर के अंदर आया तो श्रीमती जी ने तमतमाते हुए कहा नया साल था ये नहीं की बीवी रोज चाय बना के देती ही है आज हम ही बना के बेड टी दे दें। तुम्हें तो नए साल पर भी रोमांटिक होना नहीं आता है बस तुम्हारे साथ कोई दिन, साल नया हो ही नहीं सकता है । भाई हम तो बधाई दें तो मुश्किल ना दें तो और मुश्किल ....चलिए आप सब नया साल नये ढंग से मनाएं ये सब तो चलता रहता है |
मनोज कुमार ‘ मैथिल ‘

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

आजादी


आजकल साहित्य अकादमी के पुरस्कार लौटने और पद से इस्तीफा देने का दौर चल रहा है | जो की सही नहीं है | यह अपने किये गए कार्यों लेखन का अपमान है आप के हाथ में कलम है उससे विरोध करें यह क्या पुरस्कार लौटने चले हैं यदि इतना ही है तो आज तक प्राप्त सभी पुरस्कारों को लौटा दें साथ ही साथ अपनी सभी पुस्तके भी लौटा लें क्योंकि उनमे विरोध करने की ताकत नहीं है लेखनी कुंद हो चुकी है |
आप कैसे साहित्यकार हैं जिसका हथियार कलम ना होकर राजनीती हो गयी है अब आपको अपनी कलम पर भरोषा नहीं रहा जो ऐसा करने चले हैं | एकतरफा सोच की दाद है जब आप साथ रहकर खाकर कुछ नहीं कर सके तो अलग होकर क्या ? क्या लिखना छोड़ दिया ? काम ऐसा करें जो उदाहरण बने ना की बेकार का भौंडापन |
विरोध करना है तो अपने पुरस्कार की राशि निसहाय के कलयाण में लगायें यदि आपको लगता है की कुछ गलत हो रहा है तो उस सरकार , नेता पार्टी की परिक्रमा करना बंद करें उनके किसी समारोह में आज के बाद ना जाएँ ना की कोई पद स्वीकार करें | पर ऐसा दिखावा न करें | हंसी आती है ऐसे कृत्य पर जो पंचतारा होटल में समारोह मनाने की कुवत रखते हैं क्या उन्हें देश की हालत पर तरस नहीं आता है | क्यों नहीं उनका दिल तब रोता है क्यों उनकी कलम और व्यवहार अलग-अलग बोलते हैं | क्यों इसतरह की चोचले बाजी की जरूरत पड़ती है अकादमी पुरस्कार लौटने से क्या उनको अभिव्यक्ति मिल जायेगी | ऐसा नहीं होगा यह बिलकुल गलत है | आप दुसरे के पुरस्कारों के पैसे भी लौटाने की कुवत रखते हैं उसे किसी गरीब को प्रोत्साहित करो किसी गाँव घर का भला करो बेमतलब की बातें आप जैसे रसूख वाले लोगो को शोभा नहीं देती है मैं यहाँ आपके लिए साहित्यकार का प्रोयोग नहीं कर रहा क्योंकि आप सब कलम छोड़ चुके हैं या उसकी स्याही सूख चुकी है तो जब कर्म नहीं तो कर्मकार कैसा |
आन्दोलन ऐसे नहीं होता है साहित्यकार हो साहित्यकार की भाषा बोलो क्या भौंडे राजनितिक की भाषा पकड ली है क्या जो अब तक लिखा है वो बकवास है केवल व्यापार के लिए लिखा है जो पुरस्कार को व्यापार बना दिया है उस पैसे को क्यों नहीं जनकल्याण में लगाते हो  और उन निशःय को भी एक अभिव्यक्ति देते हो | यहाँ उल्टा क्यों हो रहा है इसमें किसका हित है |
मैं तो यही मानता हूँ की यदि साहित्यकार की कलम टूट गयी तो वो मर गया और जब तक उसकी कलम है तब तक वो साहित्यकार है और उसके जैसा शक्तिशाली कोई नहीं है | पर यहाँ कलम टूट रही है उससे कुछ नहीं हो रहा है बहुत ही चिंताजनक दौर है | आप लोग आने वाले नवांकुरों के लिए क्या स्थापित करेंगे की |
कब स्वहित छोड़ सब हित की बात करेंगे साहित्यकार साहित्य की परिभाषा बदलें पर क्यों तुले हैं थोडा आत्म मंथन करें खुद ही सही गलत का अंदाजा हो जाएगा |

हे कलमवीर तुम कलम चलाओ
ना, बेमतलब का स्वांग रचाओ
सब हित सब दिश बात करो तुम
मृत भाव में प्राण भरो तुम
छोड़ कलम ना बात बताओ
हे कलम वीर तुम कलम चलाओ

हुआ पुरस्कृत कलम तुम्हारा
लेखनी को न भेजो कारा
क्या उनपर है हक़ तुम्हारा?
बस लिखकर ही, तुम मान बढाओ
हे कलमवीर तुम कलम चलाओ

कर्म तुम्हारा लेखन है
धर्म तुम्हारा लेखन है
मर्म तुम्हारा लेखन है
इसी से अपना हक़ जताओ
लिख विरोध कर फर्ज निभाओ
जनकल्याण आहुति तुम बन जाओ
हे कलम वीर तुम कलम चलाओ

मनोज कुमार 'मैथिल'
#साहित्यअकादमी

रविवार, 13 सितंबर 2015