मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

आजादी


आजकल साहित्य अकादमी के पुरस्कार लौटने और पद से इस्तीफा देने का दौर चल रहा है | जो की सही नहीं है | यह अपने किये गए कार्यों लेखन का अपमान है आप के हाथ में कलम है उससे विरोध करें यह क्या पुरस्कार लौटने चले हैं यदि इतना ही है तो आज तक प्राप्त सभी पुरस्कारों को लौटा दें साथ ही साथ अपनी सभी पुस्तके भी लौटा लें क्योंकि उनमे विरोध करने की ताकत नहीं है लेखनी कुंद हो चुकी है |
आप कैसे साहित्यकार हैं जिसका हथियार कलम ना होकर राजनीती हो गयी है अब आपको अपनी कलम पर भरोषा नहीं रहा जो ऐसा करने चले हैं | एकतरफा सोच की दाद है जब आप साथ रहकर खाकर कुछ नहीं कर सके तो अलग होकर क्या ? क्या लिखना छोड़ दिया ? काम ऐसा करें जो उदाहरण बने ना की बेकार का भौंडापन |
विरोध करना है तो अपने पुरस्कार की राशि निसहाय के कलयाण में लगायें यदि आपको लगता है की कुछ गलत हो रहा है तो उस सरकार , नेता पार्टी की परिक्रमा करना बंद करें उनके किसी समारोह में आज के बाद ना जाएँ ना की कोई पद स्वीकार करें | पर ऐसा दिखावा न करें | हंसी आती है ऐसे कृत्य पर जो पंचतारा होटल में समारोह मनाने की कुवत रखते हैं क्या उन्हें देश की हालत पर तरस नहीं आता है | क्यों नहीं उनका दिल तब रोता है क्यों उनकी कलम और व्यवहार अलग-अलग बोलते हैं | क्यों इसतरह की चोचले बाजी की जरूरत पड़ती है अकादमी पुरस्कार लौटने से क्या उनको अभिव्यक्ति मिल जायेगी | ऐसा नहीं होगा यह बिलकुल गलत है | आप दुसरे के पुरस्कारों के पैसे भी लौटाने की कुवत रखते हैं उसे किसी गरीब को प्रोत्साहित करो किसी गाँव घर का भला करो बेमतलब की बातें आप जैसे रसूख वाले लोगो को शोभा नहीं देती है मैं यहाँ आपके लिए साहित्यकार का प्रोयोग नहीं कर रहा क्योंकि आप सब कलम छोड़ चुके हैं या उसकी स्याही सूख चुकी है तो जब कर्म नहीं तो कर्मकार कैसा |
आन्दोलन ऐसे नहीं होता है साहित्यकार हो साहित्यकार की भाषा बोलो क्या भौंडे राजनितिक की भाषा पकड ली है क्या जो अब तक लिखा है वो बकवास है केवल व्यापार के लिए लिखा है जो पुरस्कार को व्यापार बना दिया है उस पैसे को क्यों नहीं जनकल्याण में लगाते हो  और उन निशःय को भी एक अभिव्यक्ति देते हो | यहाँ उल्टा क्यों हो रहा है इसमें किसका हित है |
मैं तो यही मानता हूँ की यदि साहित्यकार की कलम टूट गयी तो वो मर गया और जब तक उसकी कलम है तब तक वो साहित्यकार है और उसके जैसा शक्तिशाली कोई नहीं है | पर यहाँ कलम टूट रही है उससे कुछ नहीं हो रहा है बहुत ही चिंताजनक दौर है | आप लोग आने वाले नवांकुरों के लिए क्या स्थापित करेंगे की |
कब स्वहित छोड़ सब हित की बात करेंगे साहित्यकार साहित्य की परिभाषा बदलें पर क्यों तुले हैं थोडा आत्म मंथन करें खुद ही सही गलत का अंदाजा हो जाएगा |

हे कलमवीर तुम कलम चलाओ
ना, बेमतलब का स्वांग रचाओ
सब हित सब दिश बात करो तुम
मृत भाव में प्राण भरो तुम
छोड़ कलम ना बात बताओ
हे कलम वीर तुम कलम चलाओ

हुआ पुरस्कृत कलम तुम्हारा
लेखनी को न भेजो कारा
क्या उनपर है हक़ तुम्हारा?
बस लिखकर ही, तुम मान बढाओ
हे कलमवीर तुम कलम चलाओ

कर्म तुम्हारा लेखन है
धर्म तुम्हारा लेखन है
मर्म तुम्हारा लेखन है
इसी से अपना हक़ जताओ
लिख विरोध कर फर्ज निभाओ
जनकल्याण आहुति तुम बन जाओ
हे कलम वीर तुम कलम चलाओ

मनोज कुमार 'मैथिल'
#साहित्यअकादमी