सोमवार, 31 दिसंबर 2012

मै दामनी

मै दामनी
चंचल चतुर कामनी
ओ धरा तेरे कुपुत्रों
ने क्या करा
होती रही तू कलंकित
क्यों नहीं तूं फट पड़ी
जब थी मैं लुट रही
कैसी तू निर्लज हुई
जब लिपटे थे अजगर कई
क्यों कहूँ  अजगर उन्हें
उनकी कोई  उपमा  नहीं
मैं दामनी
चंचल चतुर कामनी
अंक तेरा रंक हुआ
चन्दन भी अब पंक हुआ
आ रही दुर्गन्ध है
मदिरा बना मकरंद है 
कैसे कहूँ ए धरा शौभग्यनि
मैं दामनी
चंचल चतुर कामनी
भस्म करके काम को
शिव ने दिया वरदान जो
अभिशाप अब वो बन गया
कामांधों को है जन गया
हे महेश्वर
कृपा करो अब ये बता कर
क्यों नहीं भृकुटी तनी
मैं दामनी
चंचल चतुर कामनी  

मनोज कुमार 'मैथिल'