रह गयी है जिन्दगी
इक मजाक बनकर
आती है लब पर हंसी
आफ़ताब बनकर
आई है मेरे आँगन
काँटों से धूप छनकर
रह गयी है जिंदगी ....
खुआबों के खुआब टूटे
आँखों के पानी सूखे
खुद ही हैं खुद से रूठे
फिर, कहे किसे सितमगर
रह गयी है जिन्दगी ...
विरानो कि महफ़िलों का
ताज हमने पहना
चुप रह के गुफ्तगू का
अंदाज़ क्या है कहना
बजता नही है कोई
साज़ जो जतन कर
रह गयी है जिन्दगी ....
मनोज कुमार 'मैथिल'