गुरुवार, 4 अगस्त 2011

रह गयी है जिन्दगी

रह गयी है जिन्दगी
इक मजाक बनकर
आती है लब पर हंसी
आफ़ताब बनकर
आई है मेरे आँगन
काँटों से धूप छनकर
रह गयी है जिंदगी ....
खुआबों के खुआब टूटे
आँखों के पानी सूखे
खुद ही हैं खुद से रूठे
फिर, कहे किसे सितमगर
रह गयी है जिन्दगी ...
विरानो कि महफ़िलों का
ताज हमने पहना
चुप रह के गुफ्तगू का
अंदाज़ क्या है कहना
बजता नही है कोई
साज़ जो जतन कर
रह गयी है जिन्दगी ....

मनोज कुमार 'मैथिल'